प्री-प्राइमरी शिक्षा के अंतर्गत अध्यापकों और आंगनवाड़ियों ने सीखे अर्ली चाइल्ड केयर एजुकेशन क्रियान्वयन के गुर

          ग़ाज़ियाबाद, सरकारी स्कूलों में प्री प्राइमरी कक्षाओं के संचालन के लिए अध्यापकों और आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों को तैयार किया गया है। जनपद के ब्लॉक रज़ापुर स्थित मटियाला गांव के शिवॉम पब्लिक स्कूल में आयोजित कार्यशाला द्वारा गुरुओं को बाल मैत्री वातावरण सृजित करने के गुर सिखाए गए।

              खंड शिक्षा अधिकारी सर्वेश कुमार के निर्देशन और डाइट मेंटर पूनम सिंह व एकेडमिक रिसोर्स पर्सन रेनू चौहान की देखरेख में हैंडमेड टीचिंग लर्निंग मटेरियल के द्वारा प्रतिभागी अध्यापकों ने आयोजकों का मन मोह लिया। 

      शिवॉम पब्लिक स्कूल के एक्टिविटी हॉल में बेसिक शिक्षा परिषद और महिला एवं बाल पुष्टाहार विभाग द्वारा प्री प्राइमरी शिक्षा के अंतर्गत अर्ली चाइल्ड केयर एजुकेशन के समुचित क्रियान्वयन हेतु एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई थी। कार्यशाला में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान की प्रवक्ता व कार्यक्रम की मेंटर पूनम सिंह ने प्री प्राइमरी कक्षाओं के संचालन का लॉजिक समझाया।

              उन्हाेंने कहा कि  नेशनल एजुकेशन पॉलिसी-20 में प्री प्राइमरी कक्षाओं के संचालन पर बल देने के अतिरिक्त पूर्व में संचालित 10+2 शैक्षिक प्रणाली के स्थान पर अब 5+3+3+4 का प्रावधान कर दिया गया है। पूनम सिंह का कहना था कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में 3 से 8 साल तक के बच्चों के लिए फाउंडेशन स्टेज की बात कही गई है। बच्चे की इस फाउंडेशन स्टेज में से 2 साल आंगनवाड़ी के लिए आरक्षित हैं। इसके बाद 1 साल बाल वाटिका की कक्षा चलेगी फिर कक्षा एक और व 2 होंगी। फाउंडेशन स्टेज की अंतिम 3 कक्षाएं स्कूलों में ही संचालित की जाएंगी। मेंटर ने आह्वान किया कि वर्कशॉप में उभर कर आए विकासात्मक मुद्दों को स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों के फ़ाउंडेशन स्टेज में लाग़ू कराया जाए। 
       कार्यशाला में रज़ापुर ब्लॉक के 59 प्राइमरी स्कूलों और 55 आंगनवाड़ी केंद्रों की कार्यकत्रियों ने बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने की कार्ययोजना समझीं। कार्यक्रम का संचालन करते हुए स्टेट रिसोर्स ग्रुप की सदस्या पूनम शर्मा ने कहा कि एक आदर्श अध्यापक का लक्ष्य कक्षा के प्रत्येक बच्चे को आगे आने का मौक़ा फ़राहम करना होता है। छोटे बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने में एक अध्यापक को मनोवैज्ञानिक युक्तियों का सहारा लेना पड़ता है। बच्चे को स्कूली वातावरण में सहज होने और यहां के परिवेश में समन्वय स्थापित करने में समय दरकार होता है। शुरुआती दौर में बच्चों को कहानी सुनाना, बातचीत करना, खिलौने देना आदि ऐसे साधन हैं जिनके माध्यम से एक बच्चा अध्यापक से सहज महसूस कर सकता है।

     स्कूल की प्रिंसिपल डॉ० अंजलि सिंह ने अपने संबोधन में प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि आंगनवाड़ी की शुरुआत पुष्टाहार देने के साथ ही सन 1975 में हो गई थी। बच्चों की साइकोलॉजी समझने और समय-समय पर बच्चों की काउंसलिंग करने की आवश्यकता पर उन्होंने बल दिया। उन्होंने कहा कि अध्यापन संसार का सबसे बेहतरीन कार्य है। उन्होंने कहा कि एक नवाचारी शिक्षक समय-समय पर अपनी शिक्षण प्रणाली में सुधार करते हुए आगे बढ़ता है। कहा कि सीमित संसाधन होते हुए भी एक अध्यापक के पास शिक्षण के असीमित संसाधन और मौके मौजूद हैं। एक गुनी टीचर अपने परिवेश में मौजूद शैक्षिक संसाधनों की आसानी से पहचान कर अपने शिक्षण में उसका सही सदुपयोग कर लेता है। 

       कार्यशाला में अध्यापकों और आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों ने स्वनिर्मित शिक्षण सामग्रियों का प्रदर्शन भी किया। भानुमति का पिटारा को ख़ूब सराहा गया।

    इस अवसर पर मास्टर ट्रेनर्स डॉ० मोहम्मद सलीम, अनीता यादव, पूजा गौतम, सबीहा सुल्तान और अंशु सिंह ने विद्यार्थी केंद्रित शिक्षण विधियां- आओ करके सीखें, खेल खेल में शिक्षा और शैक्षिक नवाचार के टिप्स दिए। इस अवसर पर बाल वाटिका गतिविधियां और कक्षा कक्ष में उनकी उपलब्धता की समीक्षा और बाल वाटिका गतिविधियों के संचालन पर विस्तृत रिपोर्ट भी प्रस्तुत की गई। आंगनवाड़ी सुपरवाइज़र मीनाक्षी चौहान और रेखा ने बाल मैत्री वातावरण सृजित करने पर बल दिया। आंगनवाड़ी केंद्रों में प्री स्कूल एजुकेशन किट और ईसीसीई मैनुअल के उपयोग की बारीकियां भी समझाईं गईं।
       वर्कशॉप में अंजू मिश्रा, रेखा, मीनू, रीना, सपना, रेनू मौलिक, सीमा, अमित कुमार, डॉ० देश दीप, रमा मिश्रा और फ़राहाना आदि प्रतिभागी मुख्य रूप से मौजूद रहे।

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