ग़ज़ल: "चाक दामन सिला नहीं करते"- डॉ० यामीन चौधरी
टूटकर दिल मिला नहीं करते;
चाक दामन सिला नहीं करते!
ज़िंदगी तूने कुछ दिया भी नहीं,
फिर भी तुझसे गिला नहीं करते।
मुस्कुराने के अब नहीं मौसम,
गुल ख़िज़ां में खिला नहीं करते।
आबरु, इज़्ज़तो ह़या के चराग़,
मह़फ़िलों में जला नहीं करते।
ह़क़ ह़ुकूमत में तंग ज़हनों की,
मॉगने से मिला नहीं करते।
आस दिल में जगाती रही ज़िंदगी।
रोज़ सपने दिखाती रही ज़िंदगी।
आरज़ूयें लगीं जब भी दम तोड़ने,
मेरी आंखों में आती रही ज़िदगी।
रास्तों से मिलीं ठोकरें भी मगर,
हौसला भी दिलाती रही ज़िंदगी।
क्या हुआ तू अगर दूर मुझसे हुआ,
तेरी यादें सजाती रही ज़िदगी।
मेरे अपने ना मेरा सहारा बने,
बोझ मेरा उठाती रही ज़िदगी।
समंदरों में ग़मों के उतर गया कैसे।
कहां कहां से न जाने गुज़र गया कैसे।
सफ़र तमाम हुआ कश्मकश में यूं उसका,
उसे ख़बर ही नहीं कब वो मर गया कैसे।
तमाम उम्र बनाता रहा वो ख़ुद को मगर,
ना जाने कब वो किसी पल बिखर गया कैसे।
जो चल रहा था मेरे साथ साए की मानिंद,
मुझे वो छोड़ के हद्देनज़र गया कैसे।
दिया था हमने तो पैगा़म बस मोहब्बत का,
हमारे दिल से दग़ा कोई कर गया कैसे।
मुझे कहां था भला होश देख कर उसको,
गली में उसकी अभी था तो घर गया कैसे।
●★ डा. यामीन चौधरी ★●