अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें 7% घटी, कांग्रेस ने कहा 20 लाख करोड़ रुपए कमाने वाली सरकार तेल पर से अतिरिक्त टैक्स हटा दे तो ₹60 लीटर हो सकता है पेट्रोल
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न्यूज़ एडिटर की क़लम से |
पिछले सप्ताह तेल उत्पादन के कोटे को लेकर दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के बीच हुए मनमुटाव ने दोनों देशों के बीच बातचीत को लटका दिया था। लेकिन रविवार को ये विवाद ख़त्म हो गया और एक बयान में ओपेक कार्टेल ने घोषणा कर दी कि इराक़, कुवैत, रूस, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात अपना तेल उत्पादन बढ़ाएँगे।
लेकिन क्या भारत में पेट्रोल और डीजल की क़ीमतों में गिरावट होगी, जो इन दिनों 100 रुपए प्रति लीटर से भी अधिक है? भारत में तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों की क़ीमतों से निर्धारित होते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में घटती और बढ़ती क़ीमतों का सीधा असर भारत के आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा। लेकिन पिछले कुछ सालों से रुझान ये देखने को मिला है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की क़ीमतों में कमी के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं। इसकी वजह केवल यह है कि सरकार तेल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाती रहती है।
भारत सरकार ने अकेले जून में ख़त्म होने वाली तिमाही में तेल पर लगे एक्साइज ड्यूटी से 90,000 करोड़ रुपए से अधिक कमाई की। तो क्या इस बार भी ऐसा ही होगा? इस संबंध में अर्थशास्त्री उम्मीद जताते हैं कि इस बार भारत में तेल की क़ीमतें कम होंगी। वो कहते हैं कि ओपेक प्लस देशों के अधिक उत्पादन करने के निर्णय के साथ, निश्चित रूप से भारत में पेट्रोल और डीज़ल की खुदरा क़ीमतों पर प्रभाव पड़ेगा। वास्तव में, कच्चे तेल की भारतीय क़ीमत 19 जुलाई को घटकर 71.2 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी, जो 15 जुलाई को 75.26 डॉलर थी। बेशक, यह उसी समय संभव है, जब सरकार पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्स नहीं बढ़ाती हैं। इसलिए क़ीमतों में काफ़ी हद तक गिरावट होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की क़ीमतों में स्थिरता के साथ भारत में भी इसी तरह की गिरावट की उम्मीद कम ही है। हालांकि इस बार क़ीमत बढ़ाना सरकार की छवि के लिए सही नहीं होगा। 100 रुपए से अधिक की पेट्रोल की क़ीमत और 100 रुपए के क़रीब डीज़ल का दाम सरकार के लिए ख़राब पीआर है। इसलिए वे क़ीमतों में गिरावट को उपभोक्ताओं तक जाने दे सकती है। भारत के इतिहास में पहली बार भारतीय शहरों में पेट्रोल की क़ीमतें 100 रुपये से अधिक तक पहुँच गई हैं और डीज़ल के दाम 100 रुपए प्रति लीटर के क़रीब हैं।
भारत में कच्चे तेल का दाम अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से जुड़ा है। इसका मतलब ये हुआ कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल का दाम घटता है, तो भारत में भी घटना चाहिए और अगर तेल की क़ीमत बढती है, तो यहाँ भी इसकी क़ीमत बढ़नी चाहिए। लेकिन पिछले साल महामारी के बाद अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जब तेल का दाम तेज़ी से गिरा, और गिर कर लगभग 20 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गया, तो इसके बावजूद भारत में पेट्रोल की क़ीमत घटने के बजाए तेज़ी से बढ़ीं।
कांग्रेस पार्टी ने भारत सरकार के टैक्स को 'मोदी टैक्स' कहा और तर्क दिया कि अगर प्रधानमंत्री मोदी टैक्स हटा दें, तो दाम 60 रुपए प्रति लीटर हो सकता है। पार्टी के मुताबिक़ सरकार ने पिछले सात सालों में अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाकर 20 लाख करोड़ रुपए कमाए हैं।
तेल, गैस और डीज़ल के तेज़ी से बढ़ते दाम से आम जनता परेशान है। तेल की क़ीमत में बढ़ोतरी के कारण कई वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं, जिससे मांग में कमी आई है। अब जबकि अर्थव्यवस्था महामारी की मार के बाद ऊपर उठ रही है तो ऐसे में मांग में कमी सरकार के लिए बुरी ख़बर है।
जानकार कहते हैं कि सरकार तेल की क़ीमतें उस समय तक बढ़ने से नहीं रोकेगी, जब तक कि आम वोटरों और किसानों पर इसका सीधा असर न नज़र आए।