वाराणसी: विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के लिए मस्जिद ने दी अपनी ज़मीन, मंदिर ने भी दी 1700 के बदले 1000 वर्ग फ़ीट ज़मीन मस्जिद को।
हालाँकि आपसी समझौते के तहत मस्जिद को 1700 वर्ग फ़ीट की ज़मीन के बदले विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट ने एक हज़ार वर्ग फ़ीट ज़मीन दी है। कोर्ट के बाहर हुए इस समझौते से मंदिर और उससे जुड़े लोग यानी हिन्दू ख़ुश हैं, तो वहीं मुसलमान इसे मिसाल के तौर पर पेश कर रहे हैं। यह समझौता भले ही एक छोटे से ज़मीन के टुकड़े का है, लेकिन इसे बड़े फ़लक पर देखा जा रहा है। मस्जिद ने मंदिर को ज़मीन दी, वो भी ज्ञानवापी मस्जिद ने विश्वनाथ मंदिर को। इसे दूर से बैठे लोग बड़े आश्चर्य से देख और समझ रहे हैं। क्योंकि अयोध्या के बाद अब हिंदूवादी राजनीतिक दलों का केंद्र बिंदु वाराणसी का ज्ञानवापी मस्जिद ही बन गया है।
दरअसल ज्ञानवापी मस्जिद के पास विश्वनाथ मंदिर से सटी तीन ज़मीनें हैं। उसी में से एक प्लॉट 1700 वर्ग फ़ीट का है। इस ज़मीन पर 1991 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद ज्ञानवापी मस्जिद और विश्वनाथ मंदिर की सुरक्षा के लिए कंट्रोल रूम स्थापित किया गया था। वाराणसी राजस्व विभाग के अनुसार यह ज़मीन सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की है। इस ज़मीन को वक़्फ़ बोर्ड ने काशी विश्वनाथ मंदिर धाम को सौंपा है जिसके बदले ज्ञानवापी मस्जिद को विश्वनाथ मंदिर की ओर से 1000 वर्ग फ़ीट ज़मीन पर बना एक मकान दिया गया है। यह मकान ज्ञानवापी मस्जिद से चार सौ मीटर दूर, सड़क के दूसरी तरफ़ है। इस समझौते की सबसे मज़बूत कड़ी अंजुमन इंतज़ामिया मस्जिद के सचिव एमएस यासीन हैं।
अंजुमन इंतज़ामिया मस्जिद ही शहर के सभी मस्जिदों की देखरेख करती है। यासीन मुस्लिम पक्षकार तो हैं ही साथ ही हिन्दू भावनाओ को लेकर भी ख़ासे संजीदा हैं। उन्होंने इसके बारे में जानकारी देते हुए कहा कि विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के निर्माण के दौरान मंदिर प्रशासन को अधिक जगह की ज़रूरत है। मंदिर की ओर जाने के लिए रास्ता तंग पड़ रहा था। मस्जिद के पास 8276 प्लॉट नंबर की एक ज़मीन थी जिस पर कंट्रोल रूम बना हुआ था। मंदिर प्रशासन को यह ज़मीन देने को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों से कई दौर की बातचीत हुई। फिर समुदाय और प्रतिष्ठित लोगों से भी सहमति ली गई। सुन्नी वक़्फ़ शहर के बोर्ड से भी अनुमति लेने के बाद यह तय किया गया कि यह ज़मीन मंदिर पक्ष को दे दी जाए ताकि मंदिर का रास्ता चौड़ा हो जाए। इस समझौते में तक़रीबन डेढ़ से दो साल का समय लग गया। यासीन आगे कहते हैं कि यह ज़मीन देकर हमने तो अपनी तरफ़ से पहल कर दी है, अब आगे देखते हैं कि वो क्या करते हैं।
जिस ज़मीन का हस्तांतरण हुआ है उस ज़मीन को लेकर सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड और विश्वनाथ मंदिर के बीच तीन दशक से बनारस के न्यायालय में मुक़दमा चल रहा है। ऐसे में इस फ़ैसले से वो लोग ख़ुश हैं जो कॉरिडोर की भव्यता के लिए प्रयत्नशील रहे हैं।
काशी विश्वनाथ धाम के निर्माण में मंदिर की पौराणिकता की देखरेख कर रही काशी विद्वत परिषद के महामंत्री और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफ़ेसर रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि काफ़ी दिनों से प्रशासन और अंजुमन इंतज़ामिया मस्जिद कमेटी से ज्ञानवापी परिसर में स्थित इस ज़मीन को लेकर बात चल रही थी। इंतज़ामिया के सेक्रेटरी यासीन साहब से बात हुई कि आप इस ज़मीन को मंदिर प्रशासन को दे दीजिए इसके बदले में हम कहीं और ज़मीन देने के तैयार हैं। उन्हें भी यह मसौदा समझ में आया और बात बन गई। इसके बाद ज्ञानवापी मस्जिद की इस ज़मीन की रजिस्ट्री मंदिर के नाम कर दी गई। इसके बदले में कमेटी के नाम से व्यावसायिक इस्तेमाल की हज़ार वर्ग फ़ीट ज़मीन सड़क पर रजिस्ट्री कर दी गई है।मस्जिद और मंदिर दोनों तरफ़ के लोग उत्साहित हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर के अर्चक डॉक्टर श्रीकांत मिश्र ने काशी की गंगा-जमुनी तहज़ीब को समझाते हुए बताया कि विश्वनाथ के प्रति मुसलमानों में भी आस्था रही है। 1983 से पहले तत्कालीन मंदिर महंत पंडित रामशंकर त्रिपाठी से एक मुसलमान ने बाबा को दूध चढ़ाने का आग्रह किया था। मंदिर का महंत होने के नाते उन्होंने उस मुसलमान भक्त को मना किया और साथ ही यह भी कहा कि अगर तुम्हारी श्रद्धा है तो मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं। इस पर उसने ज्ञानवापी परिसर में ही ज़मीन पर दूध चढ़ाय। अब वही आस्था और विश्वास एक बार फिर से दिखाई दे रहा है।
ज्ञानवापी मस्जिद के नियमित नमाज़ी कहते हैं कि पहले तो कमेटी ज़मीन देने को तैयार नहीं थी, लेकिन जैसे हम मस्जिद में साफ़ रास्ते से जाते हैं वैसे ही उनका भी रास्ता साफ़ होना चाहिए। इसलिए यह ज़मीन दी गई। यह हमारा सहयोग है। हर धर्म के लोग अपनी-अपनी जगह पर हंसी ख़ुशी जाएं, इसके पीछे यही सोच है. यह एक अच्छा काम हुआ है।"
'रोज़ी-रोटी का सवाल:'
ज़मीनों के इस लेने-देन से काशी विश्वनाथ मंदिर का रास्ता तो चौड़ा हो जाएगा। और अंजुमन इंतज़ामिया मसाजिद कमेटी इस बात को उनके द्वारा हिन्दुओं के हक़ में लिए एक बड़े फ़ैसले के रूप में प्रस्तुत कर रही है। जबकि आम लोगों के बीच हो रही चर्चा भी इस लेन-देन को नफ़ा-नुक़सान की कसौटी पर कस रही है। लेकिन इस बीच कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनकी रोज़ी रोटी प्रभावित हुई है। मंदिर की ओर से मस्जिद कमेटी को जो तीन मंजिली इमारत दी गई है, उनमें कुछ हिंदुओं की भी दुकानें हैं। हालांकि अब तक हिंदू दुकानदारों को परिसर ख़ाली करने के लिए नहीं कहा गया है, लेकिन वे लोग ख़ासे चिंतित नज़र आने लगे हैं।