मत सुनिए, कहां तक न्याय संगत ?

   20 मार्च के आखिरी सप्ताह से शुरू होकर अप्रैल माह के अंत तक देश के बदनाम जमाना टीवी चैनलों और कुछ समाचार पत्रों के द्वारा कोरोना महामारी के दौरान मुसलमानों के साथ साथ तबलीगी जमाअत को मोहरा बनाकर देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय कहने का मतलब है, कि मुसलमानों पर निशाना साधते हुए देश के बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच नफरत परोसने, धार्मिक उन्माद भड़काने की नापाक साजिशें और कोशिश की गई. जिसके चलते देश के अनेक भागों ,शहरों, गांव की गलियों में घूम घूम कर कुछ घरेलू उपयोग में आने वाली चीजों को बेचने वालों का आईडी प्रूफ मांगा गया, याद रहे इस दौरान आईडी प्रूफ मैं गली गली घूम कर फेरी लगाने वाले इन लोगों के दस्तावेजों पर मुस्लिम साबित होते ही इनको तथाकथित राष्ट्र भक्तों के साथ-साथ मोदी भक्त एवं गोदी मीडिया भक्तों के द्वारा जमकर इनका मानसिक आर्थिक शोषण के साथ शारीरिक शोषण भी किया गया, यह बात किसी से ढकी छुपी नहीं ,है देश की जनता के साथ साथ पूरी दुनिया के लोगों ने इन घटनाओं को अपनी आंखों से देखा l मगर अफसोस की बात है देखने के बावजूद देश की पुलिस, सरकार का खुफिया तंत्र, सत्ताधारी पार्टी के जनप्रतिनिधि ही नहीं अन्य राजनीतिक दलों के जनप्रतिनिधियों के मुंह पर ताले और आंखों पर पर्दे पड़े रहे किसी को इस प्रकार की घटनाएं ना तो दिखाई दे और ना ही पीड़ितों की आवाज उनके साथ साथ माननीय सर्वोच्च न्यायालय के कानों तक पहुंची l जिसके चलते तथाकथित राष्ट्र भक्तों एवं गोदी मीडिया के द्वारा जहरीला कार्यक्रम लगातार चलता रहा, किसी ने भी इन घटनाओं के बारे में चर्चा करने की बात तो दूर इस और ध्यान देना भी जरूरी नहीं समझा, जिसके चलते देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को बहुसंख्यक समुदाय के कुछ लोग संदिग्ध नजरो से देखने के अलावा शक की नजरों से देखने लगे, इतना ही नहीं दाढ़ी और टोपी वाले को देख कर जान बचाने के लिए मशहूर डॉक्टर और अस्पताल भी इन्हें कोरोना वाहक बताकर इनसे दूरियां बनाने लगे , इतना ही नहीं इस अवसर पर अनेक स्थानों पर पुलिस की वर्दी में असामाजिक तत्वों ने खुलकर इनकी इबादत गाहो को भी निशाना बनाकर इनमें नमाज अदा कर बाहर निकलने वाले लोगों पर जमकर डंडे बरसाए। डंडे बरसाने वाले इन लोगों को आज तक देश की पुलिस और खुफिया तंत्र नहीं ढूंढ पाया। देश के अल्पसंख्यक समुदाय के साथ सरकार के इस व्यवहार और आचरण से विचलित होकर देश के अनेक सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों, और वास्तविक राष्ट्र भक्तों के साथ-साथ मुस्लिमों के सबसे बड़े संगठन जमीयत उलेमा ए हिंद ने इस मामले को लेकर माननीय सुप्रीम कोर्ट मैं अपील दाखिल की, जिस पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से माननीय सर्वोच्चन्यायालय द्वारा जब जब केंद्र सरकार से इस संबंध में जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया तब तक केंद्र सरकार ने अपनी दूषित मानसिकता का परिचय देते हुए देश में अराजकता दूषित मानसिकता तथा धार्मिक उन्माद भड़काने वाली शक्तियों का न केवल साथ दिया बल्कि उनको बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया। सरकारी तंत्र की इन नापाक साजिशों को देखते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अनेकों बार केंद्र सरकार को फटकार लगाई। और इस संबंध में वास्तविक तथा सही जानकारी सर्वोच्च न्यायालय को उपलब्ध कराने के लिए आदेशित किया। अभी हाल ही में तीसरी बार सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा दाखिल किए गए बयान हलसी पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने फटकार लगाते हुए कहा क्या आप अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ नहीं निभा पा रहे हैं। जो किसी भी स्थिति में सही नहीं है, इसे अब आइंदा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इतना ही नहीं इस अवसर पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और सॉलिसिटर जनरल को फटकार लगाते हुए चेतावनी दी कि अगर आप इस संबंध में सही और निष्पक्ष रिपोर्ट अगली बार पेश नहीं करेंगे तो यह जनाब आप से छीन कर किसी बाहरी संस्था के हवाले कर दी जाएगी। माननीय सर्वोच्च न्यायालय की चिंता एकदम सही है। अब देखना यह है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय की बार-बार फटकार का केंद्र सरकार और सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता पर कितना असर पड़ता है ? माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार और सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता को सुनाई गई फटकार से देश के अल्पसंख्यक समुदाय के साथ साथ धर्मनिरपेक्ष लोगों को अब विश्वास हो चला है कि सरकार को अब वास्तविक स्थिति से माननीय सर्वोच्च न्यायालय को आगाह कराना ही पड़ेगा। देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के साथ-साथ देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रणाली के पक्षधर लोगों की निगाहें अब माननीय सर्वोच्च न्यायालय की ओर लगी हुई है। और इस बात का उन्हें शिद्दत से इंतजार है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय इस संदर्भ में क्या फैसला सुनाता है।


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