।।।आभासी जीवन से सामाजिकता दरक रही है।।।
दर्शनशास्त्र की परिभाषा के अनुसार "प्रत्येक वो वस्तु (या गुण) जो वास्तविक न होते हुये भी वास्तविक वस्तु के सभी गुणों के होने की आभास कराती है आभासी होती है।
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया में करोड़ों लोग सोशल मीडिया की लत के शिकार हो गए हैं । हालात ऐसे हो चले हैं कि किसी भी तरह की ऑफलाइन गतिविधियों में लोगों की रुचि ही नहीं दिखती। न तो घरेलू और आपसी संबंधों में संवाद बचा है, न कार्यस्थल पर सार्थक वार्तालाप। इसकी वजह भी साफ है कि फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर, स्नैपचैट, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म से लगातार जुड़े रहने पर इंसानी दिमाग कुछ खास दिशाओं में सोच ही नहीं पाता।
कभी भीड़ को कातिल बनाती अफवाहें तो कभी फर्जी तस्वीरों से किसी भी चेहरे की छवि बिगाड़ डालना। कभी किसी जीते जागते सितारे की मौत की खबर फैला देना, तो कभी स्पष्टता से विचार साझा करने वाली महिला को ट्रोल किया जाना । सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर अब ऐसा आक्रामक, अराजक और लापरवाही पूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है जो असल दुनिया के सौहार्द को छीनने और उसे रक्तरंजित करने की बड़ी वजह बन रहा है। सोशल मीडिया की लत ने इन मंचों के सार्थक इस्तेमाल की उम्मीदों को बुरी तरह ध्वस्त कर दिया है। मन और जीवन पर गहरा असर डाल रहा आभासी संसार अब बदलाव नहीं, बीमारी ला रहा है। यह अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति की बजाय सामाजिक मानसिक विकृतियों का माध्यम बन रहा है। आए दिन हो रही ऐसी घटनाएं इस बात की गवाह है कि सोशल मीडिया इंसान के बदलते व्यवहार और खो रही समझ का बड़ा कारण बनता जा रहा है।
आभासी दुनिया की लत हमारी जैविक प्रक्रियाओं पर गहरा असर डाल रही है। समाज और परिवार से अलग-थलग कर देने वाली यह लत युवाओं की शिक्षा और व्यक्ति-संबंधों पर बहुत बुरा असर डाल रही है तो पारिवारिक जीवन में रिश्तों में दरार आ रही। बच्चे आत्मकेंद्रित और आक्रामक बन कम उम्र में दिशाहीन हो रहे हैं। सोशल मीडिया की लत को सिगरेट शराब की तरह माना जा रहा है। लाइक-कमेंट न मिलने या कम मिलने और स्मार्ट गेजेट की बैटरी खत्म होने की स्थितियां मन में बैचेनी पेदा करने लगी है। ऐसे लत लोगों के व्यवहार में भय और आत्ममुग्धता का आजीबोगरीब मेल दिखता है जो कहीं न कहीं और से पीछे छूट जाने की चिंता लिए है। यह चिंता आधारहीन और यह बेचैनी गैरजरूरी है। यह भावनात्मक फिक्र और डर उन बातों के लिए है जिनका असल में कोई मायने नहीं है। पिछले कुछ समय में घटित घटनाएं जैसे अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का आत्महत्या करना हो ,बक्सर(UP) जिला कलेक्टर मुकेश कुमार का जीवन से तंग आकर युवावस्था में सुसाइड करना हो, कानपुर आईपीएस सुरेंद्रसिंह नेट पर सुसाइड के तरीकों को खोजकर जहर खाकर जान देने की कोशिश करना हो, जोधपुर एम्स के चार छात्र-छात्राओं का सुसाइड करना हो, जयपुर इनकम टैक्स ऑफिसर महिला का जीवन से परेशान होकर सुसाइड करने हो, 4 महिने की फूल जैसी बच्ची के साथ बलात्कार के बाद अमानवीय करतूत हो।
यह विचारणीय प्रश्न है कि सोशल मीडिया में ही जबरदस्त उपस्थिति दिखाने वाले आखिर किस कारण से ऐसा कदम उठा रहे है। आखिर कोई न कोई समस्या उनके साथ अवश्य ही साथ रहती होगी जो उनको नितांत अकेला महसूस कराती होगी। समझा जा सकता है की आभासी दुनिया में कितनी भी अच्छाइयां क्यों न हों मगर सैकड़ों की संख्या में दोस्त होने के बाद भी व्यक्ति यहां खालीपन महसूस करता है । यदि ऐसा न होता तो क्यों फेसबुक पर नियमित रूप से सक्रिय रहने वाले 'आत्महत्या करते?? सोचने समझने की बात है कि एक मशीन को हाथ में लिए व्यक्ति किसी से वार्तालाप तो कर सकता है पर ना तो वो सामने वाले के मनोभावों को समझ सकता है और ना ही उसका अकेलापन मिटा सकता है।
अपने खालीपन को मिटाने के लिए हमें आपस में मेलजोल बढ़ाने की जरूरत है। मशीन में सामने से निकलकर वास्तविक समाज में घुलने-मिलने की जरूरत है। परिवारजनों,दोस्तों, परिचितों, सहयोगियों आदि के साथ ज्यादा से ज्यादा समय और साथ देने की जरूरत है। क्रांति करने के लिए, सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए, सामाजिक कार्य के लिए इस दुनिया से बाहर आकर लोगों के बीच जाने की जरूरत है। अभी भी न जागे तो आत्महत्या की एक लम्बी सी कड़ी हमारे सामने बनती नजर आएगी जो समूचे समाज के लिए शर्म की बात होगी। याद रहे कि अभासी दुनिया वास्तविक दुनिया से बेहतर न थी, न है और न रहेगी।
" बादशाहों की ख्वाबगाह में कहां ....... वो मजा जो घास पर सोने में है....वो मजा कहाँ जो मुतमईन हंसी में........ जो मजा एक दूसरे को देखकर रोने में है......"
उम्मेद पंवार
व्याख्याता
राउमावि कोसरिया (बाड़मेर)