महंगाई की मार
पिछले करीब 20 दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में निरंतर बढ़ोतरी हुई है ।स्वाभाविक ही इसका असर तमाम कारोबारी गतिविधियों पर पड़ेगा । कोरोना महामारी की वजह से लागू पूर्ण बंदी ने पहले ही बाजार का रंग फीका कर दिया था अब बंदी में क्रमशः ढील के समांतर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा किया जा रहा है , वह अप्रत्याशित है । लगभग एक पखवाड़े में डीजल की कीमत में ₹11 और पेट्रोल के दाम में ₹9 से ज्यादा की वृद्धि की गई है अब दोनों की कीमत 84 और नब्बे रूपए प्रति लीटर हो गई है। इसके साथ ही इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि कुछ शहरों में डीजल के दाम पेट्रोल से आगे निकल गए। हैरानी की बात है कि समूची दुनिया में कोरोना संक्रमण के मद्देनजर लागू पूर्ण बंदी के दौर में जब तेल की कीमतें अपने न्यूनतम स्तर पर रही, तब भी भारत में तेल के तेवर में कोई नरमी नहीं आई। अब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी बनी हुई है, लेकिन हमारे यहां घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम में बढ़ोतरी जारी है। जब तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव के भरोसे छोड़ा गया तो इरादा यही था कि उसी के मुताबिक तेल की कीमतें तय होगी। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि घरेलू स्तर पर तेल की कीमतों के निर्धारण में अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति का कोई असर क्यों नहीं दिखता हैं। दरअसल पेट्रोल और डीजल के दाम इस तरह बेलगाम होने को लेकर जताई जाने वाली चिंता का आधार यह है कि इसमें इजाफे के साथ साथ इसका असर बाजार के अमूमन सभी हिस्से और लगभग सभी चीजों की कीमत और उसकी खरीद बिक्री पर पड़ता है।
खासकर डीजल की कीमतें बाजार में मौजूद लगभग सभी चीजों पर असर डालती है माल ढुलाई से लेकर परिवहन तक की निर्भरता डीजल पर ही होती है। सबसे अहम यह है की खेती में, सिंचाई में आदि के लिए बड़ी तादाद में किसान आज भी डीजल पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों से लेकर जरूरत की दूसरी सभी चीजों और परिवहन खर्च में कितनी बढ़ोतरी हो जाएगी।
विडंबना यह है कि समूचे देश में पूर्ण बंदी की वजह से ज्यादातर लोगों की आर्थिक स्थिति बिगड़ चुकी है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए, तमाम उद्योग धंधे बंद पड़े हैं। व्यवसायिक गतिविधियां पूर्ण बंदी में ढील के दौर में अब भी लगभग निष्क्रिय है। यानी कि लोगों की आय तकरीबन ठहरी हुई है और क्रय शक्ति में भारी गिरावट आई है। ऐसे में बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव में एक अहम भूमिका निभाने वाले कारक के रूप में पेट्रोल और डीजल के दाम में भी इजाफा किस तरह दोहरी मार करेगा, यह समझा जा सकता है। तेल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करते हुए यह आश्वासन दिया गया था कि इसका लाभ आखिरकार उपभोक्ताओं को ही मिलेगा । लेकिन पिछले चार-पांच सालों का आंकड़ा बताता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में गिरावट का लाभ आम लोगों को नहीं मिला। अब बेरोजगारी के चरम उत्कर्ष की ओर बढ़ने और लोगों की आमदनी में भारी गिरावट के बरकस बाजार की महंगाई से एक चिंताजनक स्थिति बन रही है।
अरविन्द बिश्नोई गाँवड़ी(बागोड़ा)
सामाजिक कार्यकर्ता& पर्यावरण प्रेमी