जनपद शाहजहांपुर ! रोजे का असल मकसद तकवा पैदा करना
कुरान-ए-पाक में अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया ऐ ईमान वालों तुम पर रोजे फर्ज किये गये जैसा कि तुमसे पहले लोगों पर रोजे फर्ज किए गये थे ताकि तुम परहेजगार बनो।
कुरान-ए-पाक में अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया 'ऐ ईमान वालों तुम पर रोजे फर्ज किये गये, जैसा कि तुमसे पहले लोगों पर रोजे फर्ज किए गये थे, ताकि तुम परहेजगार बनो।' कुरान की इस आयत से दो बातें बिल्कुल साफ जाहिर होती हैं। पहली रोजे सिर्फ मुसलमानों पर ही फर्ज नहीं हुए, बल्कि जितनी भी शरीयतें यानी आसमानी मजाहिब आए हैं, उनमें भी रोजे फर्ज थे। दूसरा यह कि रोजे का असल मकसद तकवे को पैदा करना है। तकवे कि माने अल्लाह से डरना होता है। यानी इंसान एक खास वक्त से लेकर एक खास वक्त तक खाने-पीने से रुका रहता है। तन्हाई में भी, जहां उसे कोई देखने वाला न हो, कुछ नहीं खाता पीता। क्योंकि उसका ईमान है कि कोई देखे न देखे मगर अल्लाह उसे देख रहा है। यही डर रोजादार को रमजान और गैर-रमजान में बहुत से गुनाहों जैसे झूठ बोलना, बुराई करना, गलत निगाह डालना, हक मारना, रिश्वत लेना, जुआ खेलना, शराब पीना आदि से रोकता है। अरबी जुबान में रोजे को सौम कहते हैं, जिसके माने रुकना होता है। खाने-पीने और गुनाहों से रुकने को रोजा कहते हैं। साइंटिस्टों की तहकीक के मुताबिक रोजा रखने से बहुत सी जिस्मानी बीमारियां दूर होती हैं। लॉकडाउन में घरों में रुके रहने से कोरोना वायरस जैसी बीमारी से अपने आपको महफूज रखा जा सकता है।
- प्रो. सैयद मोहम्मद नोमान, प्रदेश उपाध्यक्ष, जमीयत उलमा-ए-हिद